शिमला. हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल श्री कविंदर गुप्ता ने आज कहा कि स्वराज और स्वदेशी से आत्मनिर्भर भारत तक की यात्रा राष्ट्रीय आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास की दिशा में निरंतर जारी राष्ट्रीय प्रयास का प्रतिनिधित्व करती है।

श्री गुप्ता भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस), शिमला में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संगोष्ठी का विषय केवल अकादमिक विमर्श का विषय नहीं है, बल्कि यह भारत की विकास-यात्रा, सभ्यतागत चेतना, सामाजिक एवं आर्थिक आकांक्षाओं तथा भविष्य की दृष्टि से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

खास बातें

  • श्री गुप्ता भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस), शिमला में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे।
  • राज्यपाल ने कहा कि आत्मनिर्भरता का अर्थ विश्व से अलगाव नहीं होना चाहिए।
  • विकसित भारत-2047 का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि विकसित भारत की परिकल्पना के लिए सामूहिक सहभागिता और सबका प्रयास की भावना आवश्यक है।

राज्यपाल ने कहा कि आत्मनिर्भरता का अर्थ विश्व से अलगाव नहीं होना चाहिए। भारत को अपनी क्षमताओं को सुदृढ़ करते हुए वैश्विक ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, व्यापार और सहयोग के लिए खुला रहना चाहिए। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन और अंत्योदय के विचारों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इन विचारों में व्यक्ति के समग्र विकास और समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण को विकास के केंद्र में रखा गया है।

श्री कविंदर गुप्ता ने कहा कि सार्थक विकास केवल उत्पादन और उपभोग तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें मानवीय गरिमा, सामाजिक समरसता, नैतिकता, सांस्कृतिक मूल्यों, पर्यावरणीय संतुलन और समाज के प्रत्येक वर्ग के कल्याण को भी शामिल किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि महिलाओं, किसानों, कारीगरों, श्रमिकों, उद्यमियों, जनजातीय समुदायों, ग्रामीण आबादी, युवाओं और दिव्यांगजनों को विकास की प्रक्रिया में समान अवसर मिलना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं, पारंपरिक ज्ञान, हस्तशिल्प और लघु उद्यमों को भी आत्मनिर्भरता के महत्त्वपूर्ण आधार के रूप में सुदृढ़ किया जाना चाहिए।

विकसित भारत-2047 का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि विकसित भारत की परिकल्पना के लिए सामूहिक सहभागिता और सबका प्रयास की भावना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक या तकनीकी लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय आत्मविश्वास और सामूहिक क्षमता निर्माण के प्रति प्रतिबद्धता भी है।

राज्यपाल ने कहा कि भारत की शक्ति परंपरा और आधुनिकता के बीच सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता में निहित है। उन्होंने कहा, “हमारी परंपरा मूल्य प्रदान कर सकती है, विज्ञान साधन उपलब्ध करा सकता है, लोकतंत्र संस्थाएं प्रदान कर सकता है और हमारे युवा ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं। इन सभी का समन्वय भविष्य के भारत को नई दिशा दे सकता है।”

उत्तरदायी विकास की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि प्रगति के साथ उत्तरदायित्व, प्रौद्योगिकी के साथ नैतिकता, समृद्धि के साथ संवेदनशीलता और आत्मनिर्भरता के साथ आत्मसंयम का होना आवश्यक है।

उन्होंने विद्वानों और शोध संस्थानों से भारत की विकास-दृष्टि तथा सभ्यतागत चिंतन का आलोचनात्मक और अकादमिक अध्ययन करने का आह्वान किया तथा नए प्रश्नों, शोध और बौद्धिक संवाद को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

श्री कविंदर गुप्ता ने विश्वास व्यक्त किया कि यह संगोष्ठी केवल दो दिवसीय अकादमिक आयोजन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भारत के विकास, आत्मनिर्भरता और सभ्यतागत दृष्टिकोण पर निरंतर बौद्धिक संवाद को आगे बढ़ाने में योगदान देगी।

एशियाटिक सोसायटी, मुंबई के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने ऑनलाइन माध्यम से समकालीन चुनौतियों, समस्याओं और उनके समाधान के संबंध में अपने विचार साझा किए।

इससे पूर्व, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रोफेसर हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने राज्यपाल एवं लेडी गवर्नर श्रीमती बिंदु गुप्ता का स्वागत एवं अभिनंदन किया तथा “The Quest for Atmanirbhar Bharat: From the Past, through the Present, to the Future” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के संबंध में जानकारी दी।

ऑर्गनाइज़र के संपादक श्री प्रफुल्ल केतकर ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम की संयोजक डॉ. आयुषी केतकर ने संगोष्ठी की रिपोर्ट प्रस्तुत की। संस्थान के पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार मिश्रा ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।