भारत ने आज ऑस्ट्रेलिया के होबार्ट में 28.09.2026 से 02.10.2026 के दौरान आयोजित हो रही इंटरनेशनल व्हेलिंग कमीशन (आईडब्ल्यूसी-70) की 70वीं बैठक में व्हेल तथा अन्य समुद्री स्तनधारियों (सिटेशियन) के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया।
आईडब्ल्यूसी-70 में अपने शुरुआती बयान में, भारत ने समुद्री स्तनधारियों (सिटेशियन) के प्रभावी संरक्षण हेतु रेंज देशों, वैज्ञानिक संस्थानों और संबंधित अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बीच निरंतर सहयोग के महत्व पर जोर दिया। भारत ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि संरक्षण के उपायों को मजबूत करने और सही जानकारी के आधार पर निर्णय लेने में मदद हेतु आबादी की स्थिति, वितरण, आवाजाही, प्रजनन संबंधी इकोलॉजी एवं खतरों के बारे में बेहतर वैज्ञानिक जानकारी जरूरी है।
खास बातें
- इसे 02.12.1946 को वाशिंगटन डीसी में हस्ताक्षर किए गए ‘व्हेल के शिकार को विनियमित करने वाली अंतरराष्ट्रीय संधि’ के तहत स्थापित किया गया था।
- भारत 1981 से इंटरनेशनल व्हेलिंग कमीशन का सदस्य रहा है और उसने व्हेल के संरक्षण में सक्रिय एवं अहम भूमिका निभाई है।
- भारतीय जलक्षेत्र में पाई जाने वाली समुद्री स्तनधारी जीवों की प्रजातियों को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत सबसे ऊंचे स्तर की कानूनी सुरक्षा मिलती है।
भारत ने वैज्ञानिक अध्ययनों एवं साक्ष्यों पर आधारित तरीकों के प्रति अपना समर्थन फिर से दोहराया ताकि समुद्री स्तनधारियों का संरक्षण एवं प्रबंधन सही वैज्ञानिक समझ पर आधारित होना सुनिश्चित किया जा सके। साथ ही, भारत ने समुद्री स्तनधारियों पर मंडराते खतरों से निपटने हेतु व्यावहारिक एवं स्थानीय स्तर पर उपयुक्त तरीके विकसित करने में सरकारों, अनुसंधानकर्ताओं और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर सहयोग के महत्व पर भी जोर दिया।
यह बैठक इसलिए भी खास है क्योंकि यह ‘व्हेल के शिकार को विनियमित करने वाली अंतरराष्ट्रीय संधि’ पर हस्ताक्षर की 80वीं वर्षगांठ के मौके पर हो रही है।
इंटरनेशनल व्हेलिंग कमीशन (आईडब्ल्यूसी) को व्हेल के शिकार (व्हेलिंग) के प्रबंधन और व्हेल के संरक्षण के लिए जिम्मेदार वैश्विक संस्था के तौर पर बनाया गया था। इसे 02.12.1946 को वाशिंगटन डीसी में हस्ताक्षर किए गए ‘व्हेल के शिकार को विनियमित करने वाली अंतरराष्ट्रीय संधि’ के तहत स्थापित किया गया था। इसके सदस्यों के रूप में दुनिया भर की 89 सरकारें शामिल हैं। भारत 1981 से इंटरनेशनल व्हेलिंग कमीशन का सदस्य रहा है और उसने व्हेल के संरक्षण में सक्रिय एवं अहम भूमिका निभाई है।
भारतीय जलक्षेत्र में पाई जाने वाली समुद्री स्तनधारी जीवों की प्रजातियों को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत सबसे ऊंचे स्तर की कानूनी सुरक्षा मिलती है। देश में समुद्री जैव-विविधता, जिसमें व्हेल, डॉल्फिन, डुगोंग, शार्क, रे, कछुए और कोरल शामिल हैं, को सुरक्षा प्रदान करने हेतु कई समुद्री संरक्षित क्षेत्र भी घोषित किए गए हैं।
भारत सरकार डॉल्फिन, व्हेल, सूंस (पॉरपॉइज) और उनसे जुड़े जलीय इकोसिस्टम के संरक्षण हेतु एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए ‘प्रोजेक्ट डॉल्फिन’ शुरू किया है। भारत ‘अरब सागर की हम्पबैक व्हेल’ के संरक्षण को भी खास महत्व देता है, जिसे संरक्षण के विशेष प्रयासों के लिए चुनी गई 25 प्रजातियों में शामिल किया गया है।
भारत ने इस बात को दोहराया कि इंटरनेशनल व्हेलिंग कमीशन का भविष्य का काम विज्ञान पर आधारित संरक्षण संबंधी प्राथमिकताओं, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और समुद्री स्तनधारियों के सामने मौजूद विविध खतरों से निपटने के व्यावहारिक उपायों से निर्देशित होता रहना चाहिए।

